Monday, 19 September 2011

ठहर गयी होठों पर प्यास

साँझ-सकारे खिड़की पर मैं
बैठूँ लाज शरम खोके
पिया तुम्हारी बाट जोहती
झेल रही सुधि के झोंके

आँखों में उपजे कितने ही
हरे-भरे मादक मधुमास.

अंगड़ाई की मुद्रा मानो
लदी हुई टहनी फूलों से
महकी हुई बयार प्यार की
उपजी बाँहों के झूलों से

चक्रवात सा घेरा डाले
यादों में साँसों के पास.

विरह-व्यथा को सहते-सहते
यौवन बोझ बन गया साजन
धार बँधी दिल के अँगना में
बरस रहा यादों का सावन

एक बूँद पीने की खातिर
ठहर गयी होठों पर प्यास.
- शून्य आकांक्षी

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