श्रम वंदना
चलो साथी वंदना श्रम की करें ।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
डर रहे नर - नारि अपनी आग से
चलो आँखें कभी तो नम भी करें ।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
आदमी का मूल्य क्यों कम हो रहा
आदमी का चैन-सुख क्यों खो रहा
आदमी से क्यों बड़ा पैसा हुआ
चलो बातें कभी उस धन की करें ।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
रोटियाँ जो खा रहा मेहनत बिना
मौज जोकि उड़ा रहा मेहनत बिना
बोझ जो शैतान धरती का बना
चलो बातें क्रूर मौसम की करें।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
ढोक ढेरों दे चुके हैं मंदिरों में
ख़ाक छानी मस्जिदों गिरिजाघरों में
खूब उनकी रोशनी की बात की
चलो बातें कभी तो तम की करें।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
आमजन पीड़ा में हो भय-ग्रस्त हो
दुःख के अंतिम छोर पर जब मृत्यु हो
जिन्दगी फुटपाथ पर घायल पड़ी
चलो बातें तब तो मरहम की करें।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
भेद हर पल क्यों बढ़ाते जा रहे
भेद के बल पर क्यों रोटी खा रहे
छोड़ करके 'शून्य' सब लफ्फाजियाँ
चलो बातें अब परिश्रम की करें।
चलो साथी वंदना श्रम की करें।।
- शून्य आकांक्षी