साँझ-सकारे खिड़की पर मैं
बैठूँ लाज शरम खोके
पिया तुम्हारी बाट जोहती
झेल रही सुधि के झोंके
आँखों में उपजे कितने ही
हरे-भरे मादक मधुमास.
अंगड़ाई की मुद्रा मानो
लदी हुई टहनी फूलों से
महकी हुई बयार प्यार की
उपजी बाँहों के झूलों से
चक्रवात सा घेरा डाले
यादों में साँसों के पास.
विरह-व्यथा को सहते-सहते
यौवन बोझ बन गया साजन
धार बँधी दिल के अँगना में
बरस रहा यादों का सावन
एक बूँद पीने की खातिर
ठहर गयी होठों पर प्यास.
- शून्य आकांक्षी
Monday, 19 September 2011
तुम ही तुम रहती सपनों में
खुद को खोकर ही तो मैंने
तुम्हें बसाया इन नयनों में
मेरे जीवन के दर्दों को
पीलें ऐसे गीत तो गाओ
मेरे मन की सूनी गलियाँ
नाचेंगी तुम पास तो आओ
इन्तजार में बीते पल-पल
क्योंकि तुम्ही हो बस अपनों में.
तेरा मिलना मानो अमृत-
वर्षा सी हो रही हिया में
खुशियों की कंकरियाँ जैसे
फैंकी मस्ती की नदिया में
क्यों ना नींद भाएगी मन को
तुम ही तुम रहती सपनों में.
मिलना ही मिलना हो केवल
ऐसी आशा दिल में जगाओ
अगर बिछुड़ना हो तो गुइयाँ
हरगिज मेरे पास न आओ
क्या रखा है बिना तुम्हारे
कितनी भी हसीन रैनों में.
- शून्य आकांक्षी
तुम्हें बसाया इन नयनों में
मेरे जीवन के दर्दों को
पीलें ऐसे गीत तो गाओ
मेरे मन की सूनी गलियाँ
नाचेंगी तुम पास तो आओ
इन्तजार में बीते पल-पल
क्योंकि तुम्ही हो बस अपनों में.
तेरा मिलना मानो अमृत-
वर्षा सी हो रही हिया में
खुशियों की कंकरियाँ जैसे
फैंकी मस्ती की नदिया में
क्यों ना नींद भाएगी मन को
तुम ही तुम रहती सपनों में.
मिलना ही मिलना हो केवल
ऐसी आशा दिल में जगाओ
अगर बिछुड़ना हो तो गुइयाँ
हरगिज मेरे पास न आओ
क्या रखा है बिना तुम्हारे
कितनी भी हसीन रैनों में.
- शून्य आकांक्षी
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