|| दोहा ||
श्रम के बल पर ही टिके, दुनिया देश समाज |
श्रम पूजें वंदन करें, श्रम के सिर हो ताज || 1 ||
श्रम चालीसा 'शून्य ' कवि, सुन-पढ़-गुन जग जाग |
बे-सुर के हिय सुर बसे, निकले श्रम का राग || 2 ||
|| छन्द ||
श्रम का राग बुद्धि-बल से जब निश-दिन हो उच्चारित |
श्रम का अब, श्रम का कल होगा, श्रम हर पल उद्घाटित || 3 ||
श्रम से निज को मिले बड़प्पन, श्रम से ही हो सत्ता |
श्रम का मान बढ़े इस जग में, श्रम बिन हिले न पत्ता || 4 ||
श्रम मज़हब, श्रम धरम है जिनका, श्रम से असली रिश्ता |
बहे पसीना जब राहों में, पथ ज्योतित हो उठता || 5 ||
वे धरती के असली वारिस, धरती उनकी माता |
हरित क्रांति उनसे ही आई, श्वेत क्रांति का नाता || 6 ||
श्रमिक दीप से ही जग जगमग-जगमग ज्योतित होगा |
वह जागेगा देश जगेगा, उन्नत निश्चित होगा || 7 ||
अख़बारों के पन्नों पर जो, रोज उगाते फसलें |
इससे किसे लाभ क्या होगा, वे इसकी भी सुध लें || 8 ||
कोरे उपदेशों से जग में, गंध न फैल सकेगी |
फैंक मुखौटे कर्म-क्षेत्र में, श्रम से गैल बनेगी || 9 ||
पीड़ा को चुपचाप सहें क्यों, किसकी करें प्रतीक्षा |
भीत रेत की, पवन खंभ पर, भवन बने क्यों इच्छा || 10 ||
कर्म-मार्ग जब हो प्रशस्त तब अँधियारा भागेगा |
श्रम से अमरत बरसेगा, धरती का जन जागेगा || 11 ||
श्रम के सेवक आम आदमी, पहचानें सीमाएँ |
उद्वेलित पर पत्थर दिल को करतीं, क्या पीड़ाएँ || 12 ||
सरल रेख जो बाहर दिखते, भीतर तीक्ष्ण तिकोने |
पगडंडी पर जमे अँधेरा, उनके स्वप्न घिनौने || 13 ||
जिन्हें और की चोट खरोचें, बस आनंद दिलातीं |
सूखे बादल, प्यासी धरती, अंतर हिय हुलसातीं || 14 ||
डरो न बनकर न्यून कोण, जहरी त्रिकोन पकड़ेंगे |
पोथी इनकी बाँच रहे हैं, ठहरो हम जकड़ेंगे || 15 ||
श्रमजीवी जनता के आँसू, रक्त न व्यर्थ बहेंगे |
बे-श्रम के जो चतुर खिलाड़ी, औंधे मुँह वे गिरेंगे || 16 ||
जागो श्रम के सच्चे साधक, कर्मवीर अब जागो |
जागो आर्य-अनार्य धरा-सुत, शूरवीर अब जागो || 17 ||
हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई, जनबल जब जागेगा |
श्रमिक-चेतना ज्योतित होगी, अँधियारा भागेगा || 18 ||
कलम, हथौड़े, हल, हँसिया सब श्रम हथियार सम्हालो |
निष्ठा, लगन, सत्य, उत्पादन से यह राष्ट्र बचा लो || 19 ||
उठो युवक हुंकार भरो अरू, श्रम-उष्मा से उबलो |
स्वेद विरोधी अमा रात्रि में, ज्वाला बनकर उछलो || 20 ||
मात्रभूमि के लिए जरूरी, श्रॅम की आहुति देना |
मिले रोशनी हर कोने को, किंचित तिमिर रहे ना || 21 ||
हे श्रम-सेवक, श्रम-आराधक, श्रम-सर्जक सब सुन लो |
'शून्य' पते की बात बताए, अपने हिय में गुन लो || 22 ||
सपने तक में कभी नहीं तुम, श्रम की मूर्ति बनाना |
श्रम को देव बना उसको, मंदिर में नहीं सजाना || 23 ||
वरना पाखंडी व्यवसायी, इसको हथिया लेंगे |
जगह-जगह दूकान लगाकर, अपना पेट भरेंगे || 24 ||
राजनीति के भ्रष्ट खिलाड़ी आगे तक जायेंगे |
देव कहेंगे कुछ श्रम को, कुछ दानव बतलायेंगे || 25 ||
रक्त पिपासु, माफिये, दादा खेमों में बाँटेंगे |
कुछ पकवान उड़ायेंगे, बाकी जूठन चाटेंगे || 26 ||
फिर खेमों में हिंसा भड़का, खड़े-खड़े देखेंगे |
श्रम-पुत्रों की लाशों पर, अपनी रोटी सेकेंगे || 27 ||
जिनकी अनुशंसा को कोई कलम न आगे आती |
मिट्टी-पानी-हवा प्रदूषित ही जिनकी है थाती || 28 ||
उनको ताजी हवा जरूरी, वे जो सड़े-गले हैं |
जिनके सपने ताकतवर की ठोकर तले पले हैं || 29 ||
श्रम-साधक जन-मानस को जाग्रत अब 'शून्य' करेगा |
यह श्रम चालीसा उनमें प्रेरक स्फूर्ति भरेगा || 30 ||
|| दोहा ||
श्रम चालीसा पढ़ समझ, श्रम की महिमा जान |
जगे जगावे जगत को, निज-पर हो कल्यान || 40 ||
- सी.एम.उपाध्याय ' शून्य आकांक्षी '
श्रम के बल पर ही टिके, दुनिया देश समाज |
श्रम पूजें वंदन करें, श्रम के सिर हो ताज || 1 ||
श्रम चालीसा 'शून्य ' कवि, सुन-पढ़-गुन जग जाग |
बे-सुर के हिय सुर बसे, निकले श्रम का राग || 2 ||
|| छन्द ||
श्रम का राग बुद्धि-बल से जब निश-दिन हो उच्चारित |
श्रम का अब, श्रम का कल होगा, श्रम हर पल उद्घाटित || 3 ||
श्रम से निज को मिले बड़प्पन, श्रम से ही हो सत्ता |
श्रम का मान बढ़े इस जग में, श्रम बिन हिले न पत्ता || 4 ||
श्रम मज़हब, श्रम धरम है जिनका, श्रम से असली रिश्ता |
बहे पसीना जब राहों में, पथ ज्योतित हो उठता || 5 ||
वे धरती के असली वारिस, धरती उनकी माता |
हरित क्रांति उनसे ही आई, श्वेत क्रांति का नाता || 6 ||
श्रमिक दीप से ही जग जगमग-जगमग ज्योतित होगा |
वह जागेगा देश जगेगा, उन्नत निश्चित होगा || 7 ||
अख़बारों के पन्नों पर जो, रोज उगाते फसलें |
इससे किसे लाभ क्या होगा, वे इसकी भी सुध लें || 8 ||
कोरे उपदेशों से जग में, गंध न फैल सकेगी |
फैंक मुखौटे कर्म-क्षेत्र में, श्रम से गैल बनेगी || 9 ||
पीड़ा को चुपचाप सहें क्यों, किसकी करें प्रतीक्षा |
भीत रेत की, पवन खंभ पर, भवन बने क्यों इच्छा || 10 ||
कर्म-मार्ग जब हो प्रशस्त तब अँधियारा भागेगा |
श्रम से अमरत बरसेगा, धरती का जन जागेगा || 11 ||
श्रम के सेवक आम आदमी, पहचानें सीमाएँ |
उद्वेलित पर पत्थर दिल को करतीं, क्या पीड़ाएँ || 12 ||
सरल रेख जो बाहर दिखते, भीतर तीक्ष्ण तिकोने |
पगडंडी पर जमे अँधेरा, उनके स्वप्न घिनौने || 13 ||
जिन्हें और की चोट खरोचें, बस आनंद दिलातीं |
सूखे बादल, प्यासी धरती, अंतर हिय हुलसातीं || 14 ||
डरो न बनकर न्यून कोण, जहरी त्रिकोन पकड़ेंगे |
पोथी इनकी बाँच रहे हैं, ठहरो हम जकड़ेंगे || 15 ||
श्रमजीवी जनता के आँसू, रक्त न व्यर्थ बहेंगे |
बे-श्रम के जो चतुर खिलाड़ी, औंधे मुँह वे गिरेंगे || 16 ||
जागो श्रम के सच्चे साधक, कर्मवीर अब जागो |
जागो आर्य-अनार्य धरा-सुत, शूरवीर अब जागो || 17 ||
हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई, जनबल जब जागेगा |
श्रमिक-चेतना ज्योतित होगी, अँधियारा भागेगा || 18 ||
कलम, हथौड़े, हल, हँसिया सब श्रम हथियार सम्हालो |
निष्ठा, लगन, सत्य, उत्पादन से यह राष्ट्र बचा लो || 19 ||
उठो युवक हुंकार भरो अरू, श्रम-उष्मा से उबलो |
स्वेद विरोधी अमा रात्रि में, ज्वाला बनकर उछलो || 20 ||
मात्रभूमि के लिए जरूरी, श्रॅम की आहुति देना |
मिले रोशनी हर कोने को, किंचित तिमिर रहे ना || 21 ||
हे श्रम-सेवक, श्रम-आराधक, श्रम-सर्जक सब सुन लो |
'शून्य' पते की बात बताए, अपने हिय में गुन लो || 22 ||
सपने तक में कभी नहीं तुम, श्रम की मूर्ति बनाना |
श्रम को देव बना उसको, मंदिर में नहीं सजाना || 23 ||
वरना पाखंडी व्यवसायी, इसको हथिया लेंगे |
जगह-जगह दूकान लगाकर, अपना पेट भरेंगे || 24 ||
राजनीति के भ्रष्ट खिलाड़ी आगे तक जायेंगे |
देव कहेंगे कुछ श्रम को, कुछ दानव बतलायेंगे || 25 ||
रक्त पिपासु, माफिये, दादा खेमों में बाँटेंगे |
कुछ पकवान उड़ायेंगे, बाकी जूठन चाटेंगे || 26 ||
फिर खेमों में हिंसा भड़का, खड़े-खड़े देखेंगे |
श्रम-पुत्रों की लाशों पर, अपनी रोटी सेकेंगे || 27 ||
जिनकी अनुशंसा को कोई कलम न आगे आती |
मिट्टी-पानी-हवा प्रदूषित ही जिनकी है थाती || 28 ||
उनको ताजी हवा जरूरी, वे जो सड़े-गले हैं |
जिनके सपने ताकतवर की ठोकर तले पले हैं || 29 ||
श्रम-साधक जन-मानस को जाग्रत अब 'शून्य' करेगा |
यह श्रम चालीसा उनमें प्रेरक स्फूर्ति भरेगा || 30 ||
अभिमन्यु अब नहीं अकेला चक्रव्यूह बेधेगा |
सर्प दन्त गाढ़े कितने ही गरल, न कहीं चढ़ेगा || 31 ||
चालीसा जिन पढ़ा-सुना तिन, श्रम-सम्मान सुहाता |
मृत्यु का भय नहीं सताए, जीवन उनको भाता || 32 ||
जीवन की जय-यात्रा निकले, मृत विचार को हो भय |
चेतन-गंध सुवासित होती, जड़ को मिले पराजय || 34 ||
श्रम चालीसा पढ़े गुने तिन, रोग व्याधि ना होवे |
मन प्रसन्न, तन बने निरोगी, बिन चिंता के सोवे || 34 ||
शोषित, वंचित, दलित, प्रताड़ित, पीड़ित मानव आओ |
बना संगठन, बना एकता, अपनी शक्ति बढाओ || 35 ||
अपनी मंजिल को समझो, अपनी ताकत पहचानो |
पहले करो एकता द्रढ़, फिर कुछ करने की ठानो || 36 ||
झंझावात मिलें चाहे जो, सब मिलकर काटेंगे |
दुख-सुख जो भी मिलें हम सभी, हिल-मिल कर बांटेंगे || 37 ||
'शून्य' निमंत्रण साथ चलो, हर श्रमकर भाई अपना |
वृक्ष बनें संघर्ष-बीज सब, पूरन हो यह सपना || 38 ||
जब होगी सब जनता श्रमरत, मेघ छटेंगे गम के |
यही लक्ष्य, सन्देश यही, निकले सरगम हर त्रण से || 39 ||
|| दोहा ||
श्रम चालीसा पढ़ समझ, श्रम की महिमा जान |
जगे जगावे जगत को, निज-पर हो कल्यान || 40 ||
- सी.एम.उपाध्याय ' शून्य आकांक्षी '