Saturday, 4 February 2012

          श्रम वंदना
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें ।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 
डर  रहे   नर -  नारि   अपनी  आग से
चलो  आँखें  कभी  तो  नम  भी  करें । 
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 

आदमी  का  मूल्य  क्यों  कम हो रहा 
आदमी  का  चैन-सुख  क्यों  खो  रहा
आदमी   से   क्यों   बड़ा   पैसा   हुआ
चलो  बातें  कभी  उस  धन  की करें ।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 
 
रोटियाँ   जो   खा   रहा  मेहनत  बिना 
मौज  जोकि  उड़ा  रहा  मेहनत  बिना
बोझ   जो   शैतान   धरती   का   बना
चलो   बातें   क्रूर   मौसम   की   करें।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 

ढोक   ढेरों    दे   चुके   हैं   मंदिरों   में 
ख़ाक  छानी मस्जिदों गिरिजाघरों में 
खूब    उनकी   रोशनी   की   बात  की 
चलो   बातें  कभी  तो  तम  की   करें।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 

आमजन  पीड़ा  में  हो  भय-ग्रस्त  हो
दुःख के अंतिम छोर पर जब मृत्यु हो
जिन्दगी   फुटपाथ   पर  घायल  पड़ी
चलो  बातें  तब  तो  मरहम  की  करें।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 

भेद   हर   पल   क्यों  बढ़ाते  जा  रहे
भेद  के  बल  पर  क्यों  रोटी  खा  रहे
छोड़  करके  'शून्य' सब लफ्फाजियाँ
चलो   बातें   अब   परिश्रम  की  करें।
चलो  साथी  वंदना   श्रम   की   करें।। 
                                                    - शून्य आकांक्षी


Sunday, 29 January 2012


शून्य आकांक्षी के दोहे



अगर धनिक के सामने, फैलाए नहिं हाथ |
इसका मतलब मत लगा, भूखा नहीं अनाथ ||२4अ||

अगर धनिक के सामने, फैलाए नहिं हाथ |
इसका मतलब यह नहीं, भूखा रहे अनाथ ||24ब||

अति आकाँक्षा की डगर, जाती रेगिस्तान 
'शून्य' कहे जन से जुड़ो, उपजे नखलिस्तान ||

 अपना तो बस धर्म यह, जो चाहे अपनाय |
भूखे को रोटी मिले, प्यासा पानी पाय ||32
||
 


आइना जो कुछ कह रहा, वो मत मानो साँच |
भीतर मेरे झाँक कर, देखो सुलगी आँच ||7||


आज विदेशी, देश में, हुए खड़े बाजार |
देशी ने सम्मान में, बेच दिया घरवार ||50||

आप सभी कुछ जानते, फिर भी बिलकुल मौन |
बहुएँ घर में जल रहीं, उत्तर देगा कौन ||5||

आस-पड़ोसी, दोस्त सब, नाते, रिश्तेदार |
पति-पत्नी, भाई-बहन, हुए सभी व्यापार ||36||

आँसू मेरे नैन की, चिट्ठी हैं बेनाम 
जब-तब गम औ' दर्द का, दे देते पैगाम ||
 
उनके घर में सदा ही, वास करे उजियार |
मेरे हिस्से अँधेरा, कब तक हो इंतज़ार ||3||

एनएफआईआर खान में, रतन बड़े गुणवान |
भटनागर, मूर्ती, सिन्हा, राघवैया व गुमान ||33
||


क्यों इतराते जिस्म पर, जिसको जाना छोड़ |
प्रेम करो इंसान से, दे भगवान से जोड़ ||55||

क्यों करते हो दुश्मनी, क्यों पाते हो बैर |
प्यार-बीज बोओ अगर, प्यार करेगा गैर ||62||

क्यों विरोध में नारि के, नियम, परम्परा, घात |
अग्नि-परीक्षा है कभी, कभी जुआ-सौगात ||27||


क्रिकेट के इस गेम में, खेल हो गया गौण |
हुए खिलाड़ी अब बड़े, क्रिकेट-प्रेमी मौन ||35||

कभी धूप, छाया कभी, आये अनगिन मोड़ |
सरल, वक्र चलता रहा, उपलब्धि बेजोड़ ||53||

कर्म क्षेत्र को समय कम, बहु आकांक्षी लोग |
भाँति-भाँति के भरम हैं, भाँति-भाँति के रोग ||29
||


कली कहे जब डाल पर, मुस्काता हर गात |
कैसे भूलूँगी भला, वो तूफानी रात ||23||

कुर्सी की अब जंग है, कुर्सी ही मैदान |
काबिज वे सब जगह हैं, कुर्सी जिन ईमान ||13||


ग्रंथी बैठी बुद्धि में, दूर करे अभ्यास |
सत्संग उसको ही कहें, उपजे जहाँ प्रकाश ||43||

ग़ज़ल कहो, दोहा कहो या फिर गाओ गीत |
दिल से जब हो साधना, साधे सुर संगीत ||17||

गहराई धन की नदी, गयी भावना सूख 
ह्रास मानवीय मूल्य का, हुआ मिटे किम भूख ||

गीता को यदि समझना, समझो पहले आप |
कृष्ण आपकी आत्मा, प्रथम शुद्ध कर जाप ||44||

चमचा-मालिक मंत्र जे, सिग पीढ़ी तर जाहिं 
जो मालिक कहता करो, जो करता बो नाहिं ||
 
चूल्हे से मैंने कहा, बुझी हुई क्यों आग |
बोला दिल में जल रही, जाग सके तो जाग ||49||

ज्यों-ज्यों चढ़ता छिड़कते, चमचे नकली इत्र |
काश मुझे मिल जायं वे, पहले वाले मित्र ||20||


जब तक चीख पुकार है, तब तक प्रकृति है नाय 
जंगल हो खामोश जब, नदिया तब ही गाय ||

जब तक दिल में फासले, तब तक दुखिया गाँव 
'शून्य' प्रेम-रस घोलता, छुए अमीरी पाँव ||
  
जयपुर, चेन्नई, गुहाटी, बम्बई, देहरादून |
कलम शिथिल हो जाय पर, खौले धमनी खून ||18
||


जो दोस्तों से कर रहा, भाँति-भाँति के बैर |
उससे खुश होंगे भला, अपरिचित और गैर ||61||

जंगल छोड़ा आ गया, मैं तो शहर के द्वार |
पता नहीं था यहाँ भी, मिलें भेड़िये, सियार ||48||

जाने-अनजाने कभी, मत माँगो तुम मौत 
कौन भला नारी यहाँ, चाहे अपनी सौत ||25||


जितने अनुभव कसैले, उतने मीठे गीत 
मिलते गहरे घाव तिन, जिनके गहरे मीत ||
 
जिसका था फुटपाथ पर, राज मरा वो आज |
रख देना तुम कब्र पर, दो रोटी इक प्याज ||8||

जीवन जीना है सरल, खौफ रहे यदि दूर |
प्यार करो पूरी तरह, प्यार मिले भरपूर ||40||

डॉक्टर रोता पूस में, जेठ हाँफता कूप 
सावन डरती चाँदनी, माघ काँपती धूप ||
 
तिन चरनन सिग  दंडवत, जिनके कारे खेत |
उपजै कारी फसल पर, दिखतौ धन घर श्वेत ||38||

दीप जला खुशिया रहे, सोच हुआ उजियार |
यद्यपि भीतर है सखे, वास्तव में अँधियार ||12||


दीवाली शुभकामना, मिटे सकल अँधियार |
घर-घर में दीपक जले, फैले जग उजियार ||31
||


दोहा वजनी है वही, जिसमें पीड़ा दर्द |
दीन-दुखी सेवा करे, वो ही सच्चा मर्द ||14||

दोहे में ऐसे रहो, अलंकार अनुप्रास |
मैं हूँ या फिर तुम रहो, कोइ न फटके पास ||10||


दौड़-दौड़ कर थक गया, तृष्णा मिटी न क्लेश |
जितना चाहूँ मान, यश, उतनी पहुँचे ठेस ||19||

धनी चूसता है लहू, कहे उसे व्यापार |
रोटी देते श्रमिक को, करते ज्यों उपकार ||9||

धर्म-धर्म अब खेलते सारे धार्मिक खेल |
खुदा बन गए भक्त जब, कैसे हो तब मेल ||2||


नहिं समाज का हो भला, घर का कर अपमान 
चमन महक सकता भला, कलि को कर कुर्बान ||
 
नीके लागें चाम धन, नीका लागे मान |
प्यार नहीं जिनके हिया, जीवन माटी जान ||41||

नेता था पहले कभी, जग का तारणहार |
लेकिन अब तो वह करे, राजनीति व्यापार ||37||

प्रेम गली यदि साँकरी, प्रेम मार्ग पर आउ |
दो की क्या कहते भला, सिगरे हिया समाउ ||39||

प्रेम चासनी डुबोकर, मीठे बोलो बैन 
कुछ ऐसा करके चलो, आँसू हो हर नैन ||
 
पत्थर हैं सब शहर में, क्या मूरख, मूर्धन्य 
किस घर में महफूज हो, आइना बोलो 'शून्य' ||

पतझर के आगमन पर, सन्नाटे का शोर |
फूलों की जलती चिता, दर्द वृक्ष को घोर ||63||

पति-पत्नी के बीच का, रिश्ता बड़ा विचित्र |
कभी शहद कभी है सुरा, कभी प्याज कभी इत्र ||

पाप-पुण्य तो तू निरख, मैं देखूँ हिय चोट |
प्यासे को पानी मिले, भूखा पाए रोट ||34
||

पीड़ा, गम, दुःख, दर्द, तम, जलन, चीखता मौन |
मेरे घर सब आ गए, पता दे गया कौन ||15||

बट बन सकता बीज लघु, खोल न आँखें मूँद 
वर्षा में सरिता बने, मिल-मिल छोटी बूँद ||
 
बर्बादी के बीज बो, जिस्म जताए प्यार |
कैसे देगा साथ सुख, मिलते दर्द अपार ||54||

बात अगर दिल में मुखर, खींचो रेखाचित्र |
"खुला मंच" में आपका, स्वागत मेरे मित्र ||30
||

बाहर दहशत में रहूँ, भीतर जलती आग |
मौसम के बदले बिना, कैसे बदले राग ||4||


भाषण देने से नहीं, मिलता है भगवान |
सुनता वही पुकार है, दिल से दे इंसान ||56|| 

भूल चुका हूँ रास्ता, नहीं रहा अब होश |
क्या फायदा घर हो रहा, मेरा यदि जय घोष ||21||

मजहब लूटी है हिना, शीला लूटी धर्म |
मरहम तो लग जायगा, रोकेंगे कब कर्म ||6|

यहाँ सभी तो ढो रहे, अपना-अपना बोझ |
सच्चा मानव रखे जो, औरों के लिए सोच ||60||

राजनीति में छा रहे, लम्पट, कामी, धूर्त |
मेहनतकश कंगाल हैं, मारें मौज कपूत ||28
||


राजमार्ग को छोड़ कर, पगडंडी पर काव्य |
सरपट दौड़े अनवरत, द्रश्य, पठन या श्राव्य ||16||

रोज सजाता घर मगर, छा जाती है धूल |
दिल दुर्गन्ध को दूर कर, ईश चढ़ाओ फूल ||58||

लगता है अब अस्त रवि, छोड़ बजाना गाल |
छोटे होते जा रहे, छाया हुई विशाल ||51||

विद्या, प्रेम दोऊ भले, सब सारन को सार |
एक तजे दूजा घटे, दोउ जीतें संसार ||45||

वे होते सिरमौर हैं, जन करते गुणगान 
पैरों जिनके जमीं है, सोच में है आसमान ||
 
सदा मुहब्बत में रहा, मुँह से कहा न शब्द |
साफ़ सदा करता रहा, दिल पर छाई गर्द ||57||

सभी कहें मैं शून्य हूँ, बेमतलब, बेकार |
रिश्ते से फायदा नहीं, माने पर फनकार ||26||


साथ आमजन के रहा, लेकर द्रढ़ विश्वास |
अपनी कविता में मिले, पीड़ा का इतिहास ||47||

साहब दिखते हो भले, वह पाता है बैर 
मंजिल मिलती आपको, उसके छिलते पैर ||
 

सीधी सच्ची गैल चल, ईर्ष्या, घ्रणा न पास |
प्रेम दीप जलता ह्रदय, ईश्वर तहाँ निवास ||42||

शीशे का है दिल मिरा, जो झांके वो पाय |
दुश्मन ने तोड़ा नहीं, तोड़ गया इक यार ||22||

शुरू हो गयी हर जगह, अमन-चैन की बात |
लगता है फिर से कहीं, हिंसा ने की घात ||1||

हम मृत्यु से डर रहे, जीवन छाया खौफ |
केवल एक निदान है, ईश्वर-भक्ति शौक ||59||

हमने पूछा समय से, करो न क्यों आराम |
बोला सम्मुख लक्ष्य यदि, है आराम हराम ||52||


हाँक रहे क्यों डींग तुम, व्यर्थ गांधी-वाद |
खद्दरधारी ना दिखा, गाँधी जी के बाद ||11|
                                  - शून्य आकांक्षी     

Monday, 19 September 2011

ठहर गयी होठों पर प्यास

साँझ-सकारे खिड़की पर मैं
बैठूँ लाज शरम खोके
पिया तुम्हारी बाट जोहती
झेल रही सुधि के झोंके

आँखों में उपजे कितने ही
हरे-भरे मादक मधुमास.

अंगड़ाई की मुद्रा मानो
लदी हुई टहनी फूलों से
महकी हुई बयार प्यार की
उपजी बाँहों के झूलों से

चक्रवात सा घेरा डाले
यादों में साँसों के पास.

विरह-व्यथा को सहते-सहते
यौवन बोझ बन गया साजन
धार बँधी दिल के अँगना में
बरस रहा यादों का सावन

एक बूँद पीने की खातिर
ठहर गयी होठों पर प्यास.
- शून्य आकांक्षी

तुम ही तुम रहती सपनों में

खुद को खोकर ही तो मैंने
तुम्हें बसाया इन नयनों में

मेरे जीवन के दर्दों को
पीलें ऐसे गीत तो गाओ
मेरे मन की सूनी गलियाँ
नाचेंगी तुम पास तो आओ

इन्तजार में बीते पल-पल
क्योंकि तुम्ही हो बस अपनों में.

तेरा मिलना मानो अमृत-
वर्षा सी हो रही हिया में
खुशियों की कंकरियाँ जैसे
फैंकी मस्ती की नदिया में

क्यों ना नींद भाएगी मन को
तुम ही तुम रहती सपनों में.

मिलना ही मिलना हो केवल
ऐसी आशा दिल में जगाओ
अगर बिछुड़ना हो तो गुइयाँ
हरगिज मेरे पास न आओ

क्या रखा है बिना तुम्हारे
कितनी भी हसीन रैनों में.
- शून्य आकांक्षी

Wednesday, 31 August 2011

श्रम चालीसा

|| दोहा ||
श्रम के बल पर ही टिके, दुनिया देश समाज | 
श्रम पूजें वंदन करें, श्रम के सिर हो ताज || 1 ||


श्रम चालीसा 'शून्य ' कवि, सुन-पढ़-गुन जग जाग | 
बे-सुर के हिय सुर बसे, निकले श्रम का राग || 2 || 


|| छन्द || 
श्रम का राग बुद्धि-बल से जब निश-दिन हो उच्चारित | 
श्रम का अब, श्रम का कल होगा, श्रम हर पल उद्घाटित || 3 || 


श्रम से निज को मिले बड़प्पन, श्रम से ही हो सत्ता | 
श्रम का मान बढ़े इस जग में, श्रम बिन हिले न पत्ता || 4 ||


श्रम मज़हब, श्रम धरम है जिनका, श्रम से असली रिश्ता |
बहे पसीना जब राहों में, पथ ज्योतित हो उठता || 5 ||

वे धरती के असली वारिस, धरती उनकी माता |
हरित क्रांति उनसे ही आई, श्वेत क्रांति का नाता || 6 ||

श्रमिक दीप से ही जग जगमग-जगमग ज्योतित होगा |
वह जागेगा देश जगेगा, उन्नत निश्चित होगा || 7 ||

अख़बारों के पन्नों पर जो, रोज उगाते फसलें |
इससे किसे लाभ क्या होगा, वे इसकी भी सुध लें || 8 ||

कोरे उपदेशों से जग में, गंध न फैल सकेगी | 

फैंक मुखौटे कर्म-क्षेत्र में, श्रम से गैल बनेगी || 9 ||

पीड़ा को चुपचाप सहें क्यों, किसकी करें प्रतीक्षा |
भीत रेत की, पवन खंभ पर, भवन बने क्यों इच्छा || 10 ||




कर्म-मार्ग जब हो प्रशस्त तब अँधियारा भागेगा | 
श्रम से अमरत बरसेगा, धरती का जन जागेगा || 11 ||


श्रम के सेवक आम आदमी, पहचानें सीमाएँ |
उद्वेलित पर पत्थर दिल को करतीं, क्या पीड़ाएँ || 12 ||

सरल रेख जो बाहर दिखते, भीतर तीक्ष्ण तिकोने |
पगडंडी पर जमे अँधेरा, उनके स्वप्न घिनौने || 13 ||

जिन्हें और की चोट खरोचें, बस आनंद दिलातीं |
सूखे बादल, प्यासी धरती, अंतर हिय हुलसातीं || 14 ||

डरो न बनकर न्यून कोण, जहरी त्रिकोन पकड़ेंगे |
पोथी इनकी बाँच रहे हैं, ठहरो हम जकड़ेंगे || 15 ||

श्रमजीवी  जनता के आँसू, रक्त न व्यर्थ बहेंगे | 

बे-श्रम के जो चतुर खिलाड़ी, औंधे मुँह वे गिरेंगे || 16 ||


जागो श्रम के सच्चे साधक, कर्मवीर अब जागो |
जागो आर्य-अनार्य धरा-सुत, शूरवीर अब जागो || 17 ||

हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई, जनबल जब जागेगा |
श्रमिक-चेतना ज्योतित होगी, अँधियारा भागेगा || 18 ||


कलम, हथौड़े, हल, हँसिया सब श्रम हथियार सम्हालो |
निष्ठा, लगन, सत्य, उत्पादन से यह राष्ट्र बचा लो || 19 ||



उठो युवक हुंकार भरो अरू, श्रम-उष्मा से उबलो |
स्वेद विरोधी अमा रात्रि में, ज्वाला बनकर उछलो || 20 ||


मात्रभूमि के लिए जरूरी, श्रॅम की आहुति देना |
मिले रोशनी हर कोने को, किंचित तिमिर रहे ना || 21 ||

 हे श्रम-सेवक,
श्रम-आराधक, श्रम-सर्जक सब सुन लो |
'शून्य' पते की बात बताए, अपने हिय में गुन लो || 22 ||

सपने तक में कभी नहीं तुम,
श्रम की मूर्ति बनाना |
श्रम को देव बना उसको, मंदिर में नहीं सजाना || 23 ||

वरना पाखंडी व्यवसायी, इसको हथिया लेंगे |
जगह-जगह दूकान लगाकर, अपना पेट भरेंगे || 24 ||

राजनीति के भ्रष्ट खिलाड़ी आगे तक जायेंगे |
देव कहेंगे कुछ
श्रम को, कुछ दानव बतलायेंगे || 25 ||

रक्त पिपासु, माफिये, दादा खेमों में बाँटेंगे |
कुछ पकवान उड़ायेंगे, बाकी जूठन चाटेंगे || 26 ||

फिर खेमों में हिंसा भड़का, खड़े-खड़े देखेंगे |

श्रम-पुत्रों की लाशों पर, अपनी रोटी सेकेंगे || 27 ||

जिनकी अनुशंसा को कोई कलम न आगे आती |
मिट्टी-पानी-हवा प्रदूषित ही जिनकी है थाती || 28 ||

उनको ताजी हवा जरूरी, वे जो सड़े-गले हैं |
जिनके सपने ताकतवर की ठोकर तले पले हैं || 29 ||

श्रम-साधक जन-मानस को जाग्रत अब 'शून्य' करेगा |
यह
श्रम चालीसा उनमें प्रेरक स्फूर्ति भरेगा || 30 ||

अभिमन्यु अब नहीं अकेला चक्रव्यूह बेधेगा
सर्प दन्त गाढ़े कितने  ही गरल,  न कहीं चढ़ेगा || 31 ||

चालीसा जिन पढ़ा-सुना तिन, श्रम-सम्मान सुहाता |
मृत्यु का भय नहीं सताए, जीवन उनको भाता || 32 ||

जीवन  की जय-यात्रा निकले, मृत विचार को हो भय | 
 चेतन-गंध सुवासित होती, जड़ को मिले पराजय || 34 ||

श्रम चालीसा पढ़े गुने तिन, रोग व्याधि ना होवे |
मन प्रसन्न, तन बने निरोगी, बिन चिंता के सोवे || 34 ||

शोषित, वंचित, दलित, प्रताड़ित, पीड़ित मानव आओ |
बना संगठन, बना एकता, अपनी शक्ति बढाओ || 35 ||

अपनी मंजिल को समझो, अपनी ताकत पहचानो |
पहले करो एकता द्रढ़, फिर कुछ करने की ठानो || 36 ||

झंझावात मिलें चाहे जो, सब मिलकर काटेंगे |
दुख-सुख जो भी मिलें हम सभी, हिल-मिल कर बांटेंगे || 37 ||

'शून्य' निमंत्रण साथ चलो, हर श्रमकर भाई अपना |
वृक्ष बनें संघर्ष-बीज सब, पूरन हो यह सपना || 38 ||

जब होगी सब जनता श्रमरत, मेघ छटेंगे गम के |
यही लक्ष्य, सन्देश यही, निकले सरगम हर त्रण से || 39 ||

|| दोहा ||
श्रम  चालीसा पढ़ समझ,  श्रम की महिमा जान |
जगे जगावे जगत को, निज-पर हो कल्यान || 40 ||

- सी.एम.उपाध्याय ' शून्य आकांक्षी '