शून्य आकांक्षी के दोहे
अगर धनिक के सामने, फैलाए नहिं हाथ |
अपना तो बस धर्म यह, जो चाहे अपनाय |
भूखे को रोटी मिले, प्यासा पानी पाय ||32||
आइना जो कुछ कह रहा, वो मत मानो साँच |
आज विदेशी, देश में, हुए खड़े बाजार |
देशी ने सम्मान में, बेच दिया घरवार ||50||
एनएफआईआर खान में, रतन बड़े गुणवान |
भटनागर, मूर्ती, सिन्हा, राघवैया व गुमान ||33||
क्यों इतराते जिस्म पर, जिसको जाना छोड़ |
प्रेम करो इंसान से, दे भगवान से जोड़ ||55||
क्यों करते हो दुश्मनी, क्यों पाते हो बैर |
प्यार-बीज बोओ अगर, प्यार करेगा गैर ||62||
क्रिकेट के इस गेम में, खेल हो गया गौण |
हुए खिलाड़ी अब बड़े, क्रिकेट-प्रेमी मौन ||35||
कभी धूप, छाया कभी, आये अनगिन मोड़ |
सरल, वक्र चलता रहा, उपलब्धि बेजोड़ ||53||
कर्म क्षेत्र को समय कम, बहु आकांक्षी लोग |
भाँति-भाँति के भरम हैं, भाँति-भाँति के रोग ||29||
ग्रंथी बैठी बुद्धि में, दूर करे अभ्यास |
सत्संग उसको ही कहें, उपजे जहाँ प्रकाश ||43||
ग़ज़ल कहो, दोहा कहो या फिर गाओ गीत |
दिल से जब हो साधना, साधे सुर संगीत ||17||
गहराई धन की नदी, गयी भावना सूख
ह्रास मानवीय मूल्य का, हुआ मिटे किम भूख ||
गीता को यदि समझना, समझो पहले आप |
कृष्ण आपकी आत्मा, प्रथम शुद्ध कर जाप ||44||
चमचा-मालिक मंत्र जे, सिग पीढ़ी तर जाहिं
जो मालिक कहता करो, जो करता बो नाहिं ||
चूल्हे से मैंने कहा, बुझी हुई क्यों आग |
बोला दिल में जल रही, जाग सके तो जाग ||49||
जब तक चीख पुकार है, तब तक प्रकृति है नाय
जंगल हो खामोश जब, नदिया तब ही गाय ||
जब तक दिल में फासले, तब तक दुखिया गाँव
'शून्य' प्रेम-रस घोलता, छुए अमीरी पाँव ||
जयपुर, चेन्नई, गुहाटी, बम्बई, देहरादून |
कलम शिथिल हो जाय पर, खौले धमनी खून ||18||
जो दोस्तों से कर रहा, भाँति-भाँति के बैर |
उससे खुश होंगे भला, अपरिचित और गैर ||61||
जंगल छोड़ा आ गया, मैं तो शहर के द्वार |
पता नहीं था यहाँ भी, मिलें भेड़िये, सियार ||48||
जितने अनुभव कसैले, उतने मीठे गीत
मिलते गहरे घाव तिन, जिनके गहरे मीत ||
जीवन जीना है सरल, खौफ रहे यदि दूर |
प्यार करो पूरी तरह, प्यार मिले भरपूर ||40||
डॉक्टर रोता पूस में, जेठ हाँफता कूप
सावन डरती चाँदनी, माघ काँपती धूप ||
तिन चरनन सिग दंडवत, जिनके कारे खेत |
उपजै कारी फसल पर, दिखतौ धन घर श्वेत ||38||
दीवाली शुभकामना, मिटे सकल अँधियार |
घर-घर में दीपक जले, फैले जग उजियार ||31||
धर्म-धर्म अब खेलते सारे धार्मिक खेल |
नहिं समाज का हो भला, घर का कर अपमान
चमन महक सकता भला, कलि को कर कुर्बान ||
नीके लागें चाम धन, नीका लागे मान |
प्यार नहीं जिनके हिया, जीवन माटी जान ||41||
नेता था पहले कभी, जग का तारणहार |
लेकिन अब तो वह करे, राजनीति व्यापार ||37||
प्रेम गली यदि साँकरी, प्रेम मार्ग पर आउ |
दो की क्या कहते भला, सिगरे हिया समाउ ||39||
प्रेम चासनी डुबोकर, मीठे बोलो बैन
कुछ ऐसा करके चलो, आँसू हो हर नैन ||
पतझर के आगमन पर, सन्नाटे का शोर |
फूलों की जलती चिता, दर्द वृक्ष को घोर ||63||
पाप-पुण्य तो तू निरख, मैं देखूँ हिय चोट |
प्यासे को पानी मिले, भूखा पाए रोट ||34||
पीड़ा, गम, दुःख, दर्द, तम, जलन, चीखता मौन |
बट बन सकता बीज लघु, खोल न आँखें मूँद
वर्षा में सरिता बने, मिल-मिल छोटी बूँद ||
बर्बादी के बीज बो, जिस्म जताए प्यार |
कैसे देगा साथ सुख, मिलते दर्द अपार ||54||
बात अगर दिल में मुखर, खींचो रेखाचित्र |
"खुला मंच" में आपका, स्वागत मेरे मित्र ||30||
बाहर दहशत में रहूँ, भीतर जलती आग |
भाषण देने से नहीं, मिलता है भगवान |
सुनता वही पुकार है, दिल से दे इंसान ||56||
यहाँ सभी तो ढो रहे, अपना-अपना बोझ |
सच्चा मानव रखे जो, औरों के लिए सोच ||60||
राजनीति में छा रहे, लम्पट, कामी, धूर्त |
मेहनतकश कंगाल हैं, मारें मौज कपूत ||28||
राजमार्ग को छोड़ कर, पगडंडी पर काव्य |
इसका मतलब मत लगा, भूखा नहीं अनाथ ||२4अ||
अगर धनिक के सामने, फैलाए नहिं हाथ |
इसका मतलब यह नहीं, भूखा रहे अनाथ ||24ब||
अति आकाँक्षा की डगर, जाती रेगिस्तान
'शून्य' कहे जन से जुड़ो, उपजे नखलिस्तान ||
अति आकाँक्षा की डगर, जाती रेगिस्तान
'शून्य' कहे जन से जुड़ो, उपजे नखलिस्तान ||
अपना तो बस धर्म यह, जो चाहे अपनाय |
भूखे को रोटी मिले, प्यासा पानी पाय ||32||
आइना जो कुछ कह रहा, वो मत मानो साँच |
भीतर मेरे झाँक कर, देखो सुलगी आँच ||7||
आज विदेशी, देश में, हुए खड़े बाजार |
देशी ने सम्मान में, बेच दिया घरवार ||50||
आप सभी कुछ जानते, फिर भी बिलकुल मौन |
आस-पड़ोसी, दोस्त सब, नाते, रिश्तेदार |
पति-पत्नी, भाई-बहन, हुए सभी व्यापार ||36||
आँसू मेरे नैन की, चिट्ठी हैं बेनाम
जब-तब गम औ' दर्द का, दे देते पैगाम ||
उनके घर में सदा ही, वास करे उजियार |
बहुएँ घर में जल रहीं, उत्तर देगा कौन ||5||
पति-पत्नी, भाई-बहन, हुए सभी व्यापार ||36||
आँसू मेरे नैन की, चिट्ठी हैं बेनाम
जब-तब गम औ' दर्द का, दे देते पैगाम ||
उनके घर में सदा ही, वास करे उजियार |
मेरे हिस्से अँधेरा, कब तक हो इंतज़ार ||3||
भटनागर, मूर्ती, सिन्हा, राघवैया व गुमान ||33||
क्यों इतराते जिस्म पर, जिसको जाना छोड़ |
प्रेम करो इंसान से, दे भगवान से जोड़ ||55||
क्यों करते हो दुश्मनी, क्यों पाते हो बैर |
प्यार-बीज बोओ अगर, प्यार करेगा गैर ||62||
क्यों विरोध में नारि के, नियम, परम्परा, घात |
अग्नि-परीक्षा है कभी, कभी जुआ-सौगात ||27||
क्रिकेट के इस गेम में, खेल हो गया गौण |
हुए खिलाड़ी अब बड़े, क्रिकेट-प्रेमी मौन ||35||
कभी धूप, छाया कभी, आये अनगिन मोड़ |
सरल, वक्र चलता रहा, उपलब्धि बेजोड़ ||53||
भाँति-भाँति के भरम हैं, भाँति-भाँति के रोग ||29||
कली कहे जब डाल पर, मुस्काता हर गात |
कैसे भूलूँगी भला, वो तूफानी रात ||23||
कुर्सी की अब जंग है, कुर्सी ही मैदान |
काबिज वे सब जगह हैं, कुर्सी जिन ईमान ||13||
ग्रंथी बैठी बुद्धि में, दूर करे अभ्यास |
सत्संग उसको ही कहें, उपजे जहाँ प्रकाश ||43||
दिल से जब हो साधना, साधे सुर संगीत ||17||
गहराई धन की नदी, गयी भावना सूख
ह्रास मानवीय मूल्य का, हुआ मिटे किम भूख ||
गीता को यदि समझना, समझो पहले आप |
कृष्ण आपकी आत्मा, प्रथम शुद्ध कर जाप ||44||
चमचा-मालिक मंत्र जे, सिग पीढ़ी तर जाहिं
जो मालिक कहता करो, जो करता बो नाहिं ||
चूल्हे से मैंने कहा, बुझी हुई क्यों आग |
बोला दिल में जल रही, जाग सके तो जाग ||49||
ज्यों-ज्यों चढ़ता छिड़कते, चमचे नकली इत्र |
काश मुझे मिल जायं वे, पहले वाले मित्र ||20||
जब तक चीख पुकार है, तब तक प्रकृति है नाय
जंगल हो खामोश जब, नदिया तब ही गाय ||
जब तक दिल में फासले, तब तक दुखिया गाँव
'शून्य' प्रेम-रस घोलता, छुए अमीरी पाँव ||
कलम शिथिल हो जाय पर, खौले धमनी खून ||18||
जो दोस्तों से कर रहा, भाँति-भाँति के बैर |
उससे खुश होंगे भला, अपरिचित और गैर ||61||
जंगल छोड़ा आ गया, मैं तो शहर के द्वार |
पता नहीं था यहाँ भी, मिलें भेड़िये, सियार ||48||
जाने-अनजाने कभी, मत माँगो तुम मौत
कौन भला नारी यहाँ, चाहे अपनी सौत ||25||
जितने अनुभव कसैले, उतने मीठे गीत
मिलते गहरे घाव तिन, जिनके गहरे मीत ||
जिसका था फुटपाथ पर, राज मरा वो आज |
रख देना तुम कब्र पर, दो रोटी इक प्याज ||8||
प्यार करो पूरी तरह, प्यार मिले भरपूर ||40||
डॉक्टर रोता पूस में, जेठ हाँफता कूप
सावन डरती चाँदनी, माघ काँपती धूप ||
तिन चरनन सिग दंडवत, जिनके कारे खेत |
उपजै कारी फसल पर, दिखतौ धन घर श्वेत ||38||
दीप जला खुशिया रहे, सोच हुआ उजियार |
यद्यपि भीतर है सखे, वास्तव में अँधियार ||12||
दीवाली शुभकामना, मिटे सकल अँधियार |
घर-घर में दीपक जले, फैले जग उजियार ||31||
दोहा वजनी है वही, जिसमें पीड़ा दर्द |
दीन-दुखी सेवा करे, वो ही सच्चा मर्द ||14||
दोहे में ऐसे रहो, अलंकार अनुप्रास |
मैं हूँ या फिर तुम रहो, कोइ न फटके पास ||10||
दौड़-दौड़ कर थक गया, तृष्णा मिटी न क्लेश |
जितना चाहूँ मान, यश, उतनी पहुँचे ठेस ||19||
धनी चूसता है लहू, कहे उसे व्यापार |
रोटी देते श्रमिक को, करते ज्यों उपकार ||9||
खुदा बन गए भक्त जब, कैसे हो तब मेल ||2||
नहिं समाज का हो भला, घर का कर अपमान
चमन महक सकता भला, कलि को कर कुर्बान ||
नीके लागें चाम धन, नीका लागे मान |
प्यार नहीं जिनके हिया, जीवन माटी जान ||41||
नेता था पहले कभी, जग का तारणहार |
लेकिन अब तो वह करे, राजनीति व्यापार ||37||
प्रेम गली यदि साँकरी, प्रेम मार्ग पर आउ |
दो की क्या कहते भला, सिगरे हिया समाउ ||39||
प्रेम चासनी डुबोकर, मीठे बोलो बैन
कुछ ऐसा करके चलो, आँसू हो हर नैन ||
पत्थर हैं सब शहर में, क्या मूरख, मूर्धन्य
किस घर में महफूज हो, आइना बोलो 'शून्य' ||
पतझर के आगमन पर, सन्नाटे का शोर |
फूलों की जलती चिता, दर्द वृक्ष को घोर ||63||
पति-पत्नी के बीच का, रिश्ता बड़ा विचित्र |
कभी शहद कभी है सुरा, कभी प्याज कभी इत्र ||
पाप-पुण्य तो तू निरख, मैं देखूँ हिय चोट |
प्यासे को पानी मिले, भूखा पाए रोट ||34||
पीड़ा, गम, दुःख, दर्द, तम, जलन, चीखता मौन |
मेरे घर सब आ गए, पता दे गया कौन ||15||
बट बन सकता बीज लघु, खोल न आँखें मूँद
वर्षा में सरिता बने, मिल-मिल छोटी बूँद ||
बर्बादी के बीज बो, जिस्म जताए प्यार |
कैसे देगा साथ सुख, मिलते दर्द अपार ||54||
बात अगर दिल में मुखर, खींचो रेखाचित्र |
"खुला मंच" में आपका, स्वागत मेरे मित्र ||30||
बाहर दहशत में रहूँ, भीतर जलती आग |
मौसम के बदले बिना, कैसे बदले राग ||4||
भाषण देने से नहीं, मिलता है भगवान |
सुनता वही पुकार है, दिल से दे इंसान ||56||
भूल चुका हूँ रास्ता, नहीं रहा अब होश |
क्या फायदा घर हो रहा, मेरा यदि जय घोष ||21||
मजहब लूटी है हिना, शीला लूटी धर्म |
मरहम तो लग जायगा, रोकेंगे कब कर्म ||6|
यहाँ सभी तो ढो रहे, अपना-अपना बोझ |
सच्चा मानव रखे जो, औरों के लिए सोच ||60||
राजनीति में छा रहे, लम्पट, कामी, धूर्त |
मेहनतकश कंगाल हैं, मारें मौज कपूत ||28||
राजमार्ग को छोड़ कर, पगडंडी पर काव्य |
सरपट दौड़े अनवरत, द्रश्य, पठन या श्राव्य ||16||
रोज सजाता घर मगर, छा जाती है धूल |
दिल दुर्गन्ध को दूर कर, ईश चढ़ाओ फूल ||58||
लगता है अब अस्त रवि, छोड़ बजाना गाल |
छोटे होते जा रहे, छाया हुई विशाल ||51||
विद्या, प्रेम दोऊ भले, सब सारन को सार |
एक तजे दूजा घटे, दोउ जीतें संसार ||45||
वे होते सिरमौर हैं, जन करते गुणगान
पैरों जिनके जमीं है, सोच में है आसमान ||
सदा मुहब्बत में रहा, मुँह से कहा न शब्द |
साफ़ सदा करता रहा, दिल पर छाई गर्द ||57||
साथ आमजन के रहा, लेकर द्रढ़ विश्वास |
अपनी कविता में मिले, पीड़ा का इतिहास ||47||
साहब दिखते हो भले, वह पाता है बैर
मंजिल मिलती आपको, उसके छिलते पैर ||
सीधी सच्ची गैल चल, ईर्ष्या, घ्रणा न पास |
प्रेम दीप जलता ह्रदय, ईश्वर तहाँ निवास ||42||
शुरू हो गयी हर जगह, अमन-चैन की बात |रोज सजाता घर मगर, छा जाती है धूल |
दिल दुर्गन्ध को दूर कर, ईश चढ़ाओ फूल ||58||
लगता है अब अस्त रवि, छोड़ बजाना गाल |
छोटे होते जा रहे, छाया हुई विशाल ||51||
विद्या, प्रेम दोऊ भले, सब सारन को सार |
एक तजे दूजा घटे, दोउ जीतें संसार ||45||
वे होते सिरमौर हैं, जन करते गुणगान
पैरों जिनके जमीं है, सोच में है आसमान ||
सदा मुहब्बत में रहा, मुँह से कहा न शब्द |
साफ़ सदा करता रहा, दिल पर छाई गर्द ||57||
सभी कहें मैं शून्य हूँ, बेमतलब, बेकार |
रिश्ते से फायदा नहीं, माने पर फनकार ||26||
साथ आमजन के रहा, लेकर द्रढ़ विश्वास |
अपनी कविता में मिले, पीड़ा का इतिहास ||47||
साहब दिखते हो भले, वह पाता है बैर
मंजिल मिलती आपको, उसके छिलते पैर ||
सीधी सच्ची गैल चल, ईर्ष्या, घ्रणा न पास |
प्रेम दीप जलता ह्रदय, ईश्वर तहाँ निवास ||42||
शीशे का है दिल मिरा, जो झांके वो पाय |
दुश्मन ने तोड़ा नहीं, तोड़ गया इक यार ||22||
लगता है फिर से कहीं, हिंसा ने की घात ||1||
हम मृत्यु से डर रहे, जीवन छाया खौफ |
केवल एक निदान है, ईश्वर-भक्ति शौक ||59||
हमने पूछा समय से, करो न क्यों आराम |
बोला सम्मुख लक्ष्य यदि, है आराम हराम ||52||
हाँक रहे क्यों डींग तुम, व्यर्थ गांधी-वाद |
खद्दरधारी ना दिखा, गाँधी जी के बाद ||11|
- शून्य आकांक्षी
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