Monday, 19 September 2011

तुम ही तुम रहती सपनों में

खुद को खोकर ही तो मैंने
तुम्हें बसाया इन नयनों में

मेरे जीवन के दर्दों को
पीलें ऐसे गीत तो गाओ
मेरे मन की सूनी गलियाँ
नाचेंगी तुम पास तो आओ

इन्तजार में बीते पल-पल
क्योंकि तुम्ही हो बस अपनों में.

तेरा मिलना मानो अमृत-
वर्षा सी हो रही हिया में
खुशियों की कंकरियाँ जैसे
फैंकी मस्ती की नदिया में

क्यों ना नींद भाएगी मन को
तुम ही तुम रहती सपनों में.

मिलना ही मिलना हो केवल
ऐसी आशा दिल में जगाओ
अगर बिछुड़ना हो तो गुइयाँ
हरगिज मेरे पास न आओ

क्या रखा है बिना तुम्हारे
कितनी भी हसीन रैनों में.
- शून्य आकांक्षी

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